हवा और पानी मे जहर घोल रहा खुले मे डंप किया जा रहा कचरा, इस तरह शहरवासियो को कर रहा खोखला

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मुजफ्फरपुर, शहर की साफ-सफाई ही नहीं, शहर से निकलने वाले कचरे के सुरक्षित निष्पादन करने में भी नगर निगम विफल साबित हुआ है। प्रतिदिन शहर से निकलने वाले दो सौ टन कचरे को रौतनिया डंपिंग साइट पर खुले में डंप किया जा रहा है जो हवा एवं पानी, दोनों में जहर घोल रहा है। अभी तो बरसात है लेकिन अन्य दिनों में जहां-तहां खुले में जमा कचरे में आग दिया जाता है। हवा जहरीली हो जाती है। बरसात में बारिश के पानी के साथ कचरे का जहरीला पदार्थ भू-गर्भ जल को दूषित कर रहा है। इस प्रकार दूषित हवा एवं पानी लोगों की सेहत खराब कर रहा है।

कठघरे में सरकार, निगम व प्रदूषण पर्षद

कचरा प्रबंधन एवं संचालन नियम 1959 के तहत कचरे को जमा करने एवं उसके निष्पादन के लिए जगह की पहचान एवं उसके प्रबंधन का दायित्व राज्य सरकार, बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद एवं नगर निगम का है, लेकिन मुजफ्फरपुर में किसी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं समझी और शहर कूड़े का ढेर बनता जा रहा हैं।

कचरे को जमा करने एवं उसके निष्पादन के लिए जगह एवं प्रबंधन की व्यवस्था नहीं होने से शहर से निकलने वाला सैकड़ों टन कूड़ा खेल मैदानों, तालाबों, पार्को एवं सार्वजनिक स्थानों पर जमा किए गए, जिससे उनका अस्तित्व तक समाप्त हो गया।

कचरा निष्पादन का कागजी प्रबंधन

नगर क्षेत्र से निगलने वाले कचरे को जमा करने एवं उसके प्रबंधन के लिए सरकारी स्तर पर एक दशक पूर्व योजना बनाई गई थी। वर्ष 1995 में राज्य सरकार ने जिला प्रशासन को पत्र लिखकर कचरा प्रबंधन के लिए शहर से बाहर एक एकड़ जमीन उपलब्ध कराने को कहा था। सरकार के निर्देश पर आलोक में तत्कालीन जिलाधिकारी ने नगर निगम को यह जिम्मेवारी सौंपी थी। निगम ने कांटी थाना अंतर्गत रौतिनिया गांव में एक एकड़ जमीन उपलब्ध कराने को तैयार हो गया था। उसके बाद जिला प्रदूषण नियंत्रण पर्षद द्वारा संबंधित क्षेत्र का पर्यावरणीय मूल्यांकन प्रतिवेदन की तैयार करने का कार्य भी शुरू किया गया लेकिन उसके बाद योजना अधर में लटक गई। दिसंबर 2014 में भी सरकार के निर्देश पर बुडको ने शहर से निकलने वाले कचरे के निष्पादन को 72 करोड़ की योजना बनाई थी। इसके लिए निगम से 3.43 एकड़ जमीन की मांग की गई थी। नगर निगम रौतनिया में जमीन देने को तैयार भी था। लेकिन कचरा निष्पादन की यह योजना भी कागजी साबित हुई।

दिखावे को तैयार की जा रही कचरे से खाद

शहर को कचरा मुक्त बनाने के लिए पायलट प्रोजेक्ट के रूप में ‘स्वच्छता, स्वास्थ्य एवं स्मृद्धिÓ कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी। इसके तहत शहर से निकलने वाले कचरे का डोर-टू-डोर कलेक्शनन एवं प्रोसेसिंग का दावा किया गया। इसके लिए लाखों रुपये खर्च कर कंपनीबाग, चंदवारा पानीकल, सिकंदरपुर स्टेडियम के बहार एवं विवि गणित विभाग के सामने खाद तैयार करने को पिट भी बनाए गए। लेकिन उनका कितना लाभ मिल रहा यह सवालों के घेरे में है।

कचरे के ढेर पर फेंक देते मृत पशु

मृत पशुओं के निपटारे की निगम के पास कोई व्यवस्था नहीं है। उन्हें भी उठाकर कचरे के ढेर पर या खुले में फेंक दिया जाता है। इससे हवा प्रदूषित होती है।

कचरा बन सकता है आर्थिक समृद्धि का संसाधन

समाजिक कार्यकर्ता एवं सेवानिवृत बैंककर्मी अनिल कुमार सिन्हा ने कहा है कि शहर से निकले वाला कचरा न सिर्फ हवा को जहरीला बनाता है बल्कि जल एवं मृदा को भी प्रदूषित करता है। निपटने की व्यवस्था नहीं होने के कारण अवैज्ञानिक तरीके से खुले में जलाया जाता है या डंपिंग स्थलों पर ऐसे ही छोड़ दिया जाता है। कचरा जलने से हानिकारक डाईऑक्सिन, फ्युरान, मिथेन और ब्लैक कार्बन उत्सर्जित हो वायुमंडल में मिल जाता है। इस प्रकार कचरा हवा में जहर घोल देता है। कचरे के निष्पादन की जिम्मेदारी नगर निगम की है। निगम चाहे तो कचरे को आर्थिक संसाधन में परिवर्तित कर लाभ कमा सकता है। कचरे से खाद एवं बिजली बनाकर मुनाफा कमा समता है। प्लास्टिक कचरे का उपयोग सड़क बनाने में किया जा सकता है।

इनपुट : जागरण

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