बीते चार-पांच सालों में देश में जितने सांप्रदायिक उपद्रव हुए हैं, उसके पीछे कहीं न कहीं पॉपुलर फ्रंट आफ इंडिया, अर्थात पीएफआई का नाम सामने आता ही है। शाहीन बाग का सीएए विरोधी धरना, दिल्ली दंगे, रामनवमी पर देशभर में उपद्रव या फिर कर्नाटक में हिजाब विवाद। उत्तर से लेकर दक्षिण तक देश जहां भी सांप्रदायिक आग में जला है, जांच में किसी न किसी रूप में पीएफआई का नाम सामने आया है। सवाल यह है कि इतनी सारी संदिग्ध गतिविधियों के बावजूद केन्द्र सरकार की ओर से पीएफआई पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाता?

अभी इसी साल अप्रैल के महीने में एक खबर सामने आयी कि अगले हफ्ते केन्द्रीय गृह मंत्रालय में पीएफआई को प्रतिबंधित करने के लिए बैठक होने जा रही है। लेकिन 15 अप्रैल को पहली बार यह खबर सामने आयी और 19 अप्रैल को गृह मंत्रालय की सफाई आ गयी कि “मीडिया में आई वो रपटें बेबुनियाद हैं जिसमें कहा गया है कि गृह मंत्रालय पीएफआई को प्रतिबंधित करने के लिए बैठक करने जा रहा है। ऐसी कोई बैठक प्रस्तावित नहीं है।”

लगभग दो महीने बाद आज तक गृह मंत्रालय में पीएफआई को प्रतिबंधित करनेवाली कोई बैठक हुई भी नहीं। इस बीच 13 जुलाई को हुई पटना पुलिस की कार्रवाई में पीएफआई का विजन 2047 जरूर सामने आया है जिसमें 2047 तक भारत में इस्लामिक शासन स्थापित करने की बात कही गयी है।

ऐसा नहीं है कि पीएफआई जो कह रहा है दूसरे इस्लामिक संगठन वो नहीं सोचते या बोलते। इस्लाम का बुनियादी सिद्धांत ही पूरी दुनिया में दार उल खिलाफा स्थापित करने का है। दुनिया के वो सारे लोकतांत्रिक देश जहां इस्लामिक शासन नहीं है, वहां इस्लामिक शासन के लिए पीढी दर पीढी काम करना यह तो इस्लामिक शरीयत का बुनियादी सिद्धांत है। इसलिए भारत में भी तमाम इस्लामिक संगठन इस तरह की बात करते रहते हैं जैसा अपने विजन डॉक्युमेन्ट 2047 में पीएफआई ने किया है।

लेकिन बाकी इस्लामिक समूहों की तरह पीएफआई इसके लिए मदरसे नहीं चलाता है। भारत में इस्लामिक शासन स्थापित करने के लिए पीएफआई ने बाहरी दिखावे के लिए बहुत सेकुलर और डेमोक्रेटिक रास्ते अपनाये हैं। अपने घोषित उद्देश्यों के लिए वह चरमपंथी आतंकी तरीकों का इस्तेमाल नहीं करता बल्कि सेकुलर लोकतंत्र के संवैधानिक दायरे में रहकर इस्लामिक शासन की बात को आगे बढाता है। जैसे, वह सेकुलरिज्म, भारत की महान मिश्रित सभ्यता, सर्वधर्म समादर इत्यादि की बात करते हुए आरएसएस को कट्टरपंथी संस्था बताना शुरु करता है।

फिर पीएफआई से जुड़े लोग ये साबित करते हैं कि भारत जैसे “बहुलतावादी” और “सेकुलर” लोकतंत्र के लिए पीएफआई नहीं बल्कि आरएसएस जैसे हिन्दूवादी संगठन खतरा हैं। वह तो ऐसे खतरों से देश को बचाने के लिए काम कर रहा है। इसके बाद पीएफआई से जुड़े लोग धीरे धीरे बातचीत में दूसरे लोगों को इस्लाम की ओर ले जाते हैं और समझाते हैं कि कैसे इस्लामिक शासन ही भारत की समस्याओं का समाधान है। वो इस्लामिक शासन को आईसिस या तालिबान की तरह कोई कट्टरपंथी शासन बताने की बजाय काफिरों के लिए भी कल्याणकारी साबित करने का प्रयास करते हैं। इसलिए उन्होंने अपने राजनीतिक पार्टी का नाम सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ इंडिया रखा है।

असल में पीएफआई भारत में किसी दोमुंहे सांप की तरह काम कर रहा है। वह आतंकी विचारों और गतिविधियों को सोशलिस्ट और डेमोक्रेटिक गतिविधि के रूप में संचालित करता है जिसका अधिकार उन्हें भारतीय संविधान से प्राप्त होता है। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अल्पसंख्यक अधिकारों का पीएफआई बहुसंख्यकों के खिलाफ बहुत सुनियोजित तरीके से उपयोग करता है। ऐसा संभवत: इसलिए क्योंकि जिस स्टूडेन्ट इस्लामिक मूवमेन्ट आफ इंडिया (सिमी) को 2001 में प्रतिबंधित कर दिया गया, उससे पीएफआई ने काफी सबक सीखा है। पीएफआई और एसडीपीआई की स्थापना जिस ई अबूबकर ने की है वह स्वयं सिमी का केरल चीफ था। अबूबकर एक बहुत लो प्रोफाइल रहनेवाला व्यक्ति है। वह सार्वजनिक रूप से लोगों के सामने बहुत कम आता है और परदे के पीछे से लगातार पीएफआई को मजबूत करने का काम करता रहता है।

आज पीएफआई के बैनर तले कई तरह के संगठन काम कर रहे हैं। इसमें राजनीतिक रूप से एसडीपीआई, छात्रों के बीच कैम्पस फ्रंट आफ इंडिया तथा महिलाओं के बीच नेशनल वोमेन फ्रंट। इन अलग अलग फ्रंट के माध्यम से पीएफआई अपने इस्लामिक एजंडे को सेकुलर तथा डेमोक्रेटिक तरीके से आगे बढाता है। जैसे आज से एक दशक पहले जब पीएफआई ने केरल में अपने कैडर को सशस्त्र हथियारों की ट्रेनिंग देकर उनका शक्ति प्रदर्शन शुरु किया तो उसे फ्रीडम मार्च का नाम दिया। हाल में कर्नाटक में कैम्पस फ्रंट आफ इंडिया से जुड़ी जिस लड़की ने हिजाब के लिए स्कूल में हंगामा किया उसने हिजाब को स्त्रियों का दमन बताने की बजाय इसे फ्रीडम ऑफ च्वाइस बताकर इसे अपना संवैधानिक अधिकार बताया।

पीएफआई के लोग इस बात को जानते हैं कि भारत में हथियार रखना अपराध नहीं है, हथियार से किसी को चोट पहुंचाना अपराध होता है। इसी तरह कोई क्या खाता और क्या पहनता है, उसकी आजादी उसे संविधान देता है। कोई कानूनन इस पर प्रतिबंध कैसे लगा सकता है?

केरल सरकार ने 2012 में पीएफआई को प्रचिबंधित आतंकी संगठन सिमी का दूसरा रूप बताया था लेकिन फिर भी वो पीएफआई पर आज तक रोक नहीं लगा पाये। इसी तरह केरल हाईकोर्ट ने इसी साल 14 मई को अपनी एक टिप्पणी में आतंकी समूह तक बता दिया था लेकिन आगे कोई कार्रवाई करने से मजबूरी जता दी कि कानूनन उस पर कोई प्रतिबंध नहीं है। झारखण्ड की भाजपा सरकार ने फरवरी 2019 में पीएफआई को प्रतिबंधित कर दिया था लेकिन पीएफआई इस प्रतिबंध के खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट चला गया जहां अगस्त 2018 में झारखंड हाईकोर्ट ने बैन को निरस्त कर दिया।

इसके बाद फरवरी 2019 में झारखण्ड सरकार ने एक बार फिर पीएफआई की गतिविधियों को गैरकानूनी बताकर प्रतिबंधित कर दिया और उससे जुड़ी हर गतिविधि पर कानूनन रोक लगा दी। लेकिन पीएफआई की गतिविधियां न केवल जारी हैं बल्कि झारखण्ड उनके लिए आय का प्रमुख स्रोत भी बन गया है। 14 जुलाई को हिन्दुस्तान में छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि आज संथाल परगना में अवैध खनन का 25 प्रतिशत हिस्सा पीएफआई से जुड़े लोगों के हाथ में है। जिससे होनेवाली कमाई का हिस्सा पीएफआई के काम के लिए बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल और केरल तक भेजा जाता है।

ये घटनाक्रम इस बात को समझने के लिए पर्याप्त हैं कि पीएफआई भारत में संविधान प्रदत्त अधिकारों की आड़ में अपने इस्लामिक एजंडे को आगे बढा रहा है। ऐसे में कोई भी सरकार उस पर प्रतिबंध कैसे लगा सकती है? अगर लगा दिया तो पीएफआई के पास बड़े से बड़े वकीलों की भारी भरकम फौज है जिसके सहारे वो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में उसे चुनौती देते हैं। हादिया मामले में यह जानते हुए कि सीधे सीधे इस्लामिक एजंडा है, सुप्रीम कोर्ट को पीएफआई के हक में फैसला देना पड़ा था। केन्द्र सरकार भी इन परिस्थितियों से अनजान नहीं है। इसलिए चाहकर भी पीएफआई को सिमी की तरह प्रतिबंधित नहीं कर सकती।

2018 में प्रवर्तन निदेशालय ने पीएफआई और एसडीपीआई के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। वह इन संगठनों में हुए संदिग्ध लेन देन की जांच कर रहा है। जनवरी 2020 में उसने इनके चीफ अबूबकर को पूछताछ के लिए बुलाया था लेकिन उस समय वह कैंसर से पीड़ित होने का बहाना बनाकर नहीं गया। उसके बाद से ईडी की जांच भी आगे नहीं बढ पाई तो पीएफआई पर पूरी तरह कानूनी प्रतिबंध की बात ही बेमानी हो जाती है।

source: oneindia.com

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