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बिहार की राजनीति में इन दिनों आरसीपी सिंह के नाम से गरमाई हुई है. एक नौकरशाह से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सबसे करीबी बनने और उसके बाद जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष से केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने तक का सफर तय कर चुके आरसीपी मौजूदा समय में अपने जीवन का सबसे बड़ा पतन झेल रहे हैं.

उन्हें बीते दिनों जदयू की प्राथमिकता सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ा था. उनके इस पूरे सियासी सफर में कामयाबी की बुनियाद का बड़ा हिस्सा धोखे और झूठ पर टिका हुआ था. जिसमें उदाहरण के तौर पर चुनाव में दरभंगा सीट का नाम लिया जा सकता है. असल में दरभंगा सीट पर वह नीतीश कुमार और जदयू के साथ बड़ा खेल कर गए थे. ऐसे ही उनके कुछ झुठ को बयां करती टीवी9 की एक्सक्लूसिव इनसाइडर स्टोरी…


2017 के बाद से संदिग्ध होने लगे थे आरसीपी
नौकरशाह की पारी को विराम देने के बाद आरसीपी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी थे. कुल मिलाकर आरसीपी 25 साल से नीतीश कुमार के साथ थे. उनके साथ से शुरू हुआ यह सफर नीतीश कुमार के नंबर दो बनने तक परवान चढ़ा. लेकिन साल 2017 में बीजेपी और जेडीयू के दोबारा करीब आने के बाद उनकी गतिविधियां संदिग्ध हो चुकी थी. वहीं साल 2021 में आरसीपी सिंह का केन्द्र में मंत्री बनना उनकी राजनीतिक ताबूत का आखिरी कील साबित हुआ. इसके बीच केपांच सालों से आरसीपी नीतीश कुमार और पार्टी को लगातार धोखे में रख रहे थे.


2019 लोकसभा चुनाव में दरभंगा सीट पर आरसीपी का खेल
2019 के लोकसभा चुनाव में आरसीपी दरभंगा सीट पर बड़ा खेल कर गए थे. यह खेल नीतीश कुमार और जदयू को धोखे में रखने का था. असल मेंसाल 2019 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू सुप्रीमो नीतीश कुमार वर्तमान मंत्री संजय झा को दरभंगा से चुनाव लड़ाना चाहते थे. आरसीपी सिंह लोकसभा चुनाव से तीन महीने पहले से नीतीश कुमार को आश्वस्त करते रहे कि दरभंगा से बिहार में वर्तमान कैबिनेट मंत्री संजय झा जेडीयू कोटे से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे. लेकिन, टिकट बंटवारे के समय बीजेपी ने दरभंगा सीट को अपने पास रख लिया. दरअसल बीजेपी ने दरभंगा सीट में मैथिल ब्राह्मण की संख्या अधिक होने का हवाला देते हुए इस सीट को अपने पास रखा लिया. लेकिन इसमें बड़ा खेल आरसीपी सिंह की तरफ से किया गया.

जेडीयू के सूत्रों के मुताबिक एक तरफ आरसीपी सिंंह दरभंगा सीट को लेकर नीतीश कुमार को आश्वस्त करते रहे. तो वहीं दूसरी तरफ उन्होंने बीजेपी के सामने कभी भीदरभंगा सीट की डिमांड ही नहीं की. ऐसे में नीतीश कुमार इस सीट को लेकर बीजेपी की तरफ से ऐलान होने तक गुमराह होते रहे.


नीतीश ने जब सच पता किया तो खुला राज
इस लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर बीजेपी और जेडीयू के बीच रिश्ते गड़बड़ाने लगे. जिसमें दरभंगा सीट भी एक वजह बनी. ऐसे में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मोर्चा संभालते हुए जब बीजेपी के आला नेताओं से सच जानने की कोशिश की तो आरसीपी सिंह की सच्चाई सामने आई. इस दौरान नीतीश कुमार को पता चला कि चुनाव में बीजेपी से हुई बातचीत के क्रम में कभी भी आरसीपी सिंह ने दरभंगा सीट को जेडीयू के कोटे में देने की बात ही नहीं कही.




खेल से नीतीश को सदमा तो आरपीसी को मिली थी जीत
दरभंगा सीट बीजेपी के कोटे में जाने से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बेहद ही खफा हुए थे. असल में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने करीबी संजय झा को इस सीट से लोकसभा चुनाव लड़ाना चाहते थे और दरभंगा से चुनाव लड़ने की मंशा से वहां काफी काम भी कर रहे थे. लेकिन, बीजेपी कोटे में सीट जाने की वजह से नीतीश कुमार और संजय झा को गहरा सदमा लगा था. लेकिन, इस खेल के बाद आरसीपी सिंह बेहद खुश थे.

जेडीयू के एक बड़े नेता कहते हैं कि दरअसल आरसीपी नहीं चाहते थे कि संजय झा लोकसभा पहुंचे क्योंकि संजय झा जेडीयू और बीजेपी के बीच की कड़ी बनने का गुण रखते हैं.दरअसल संजय झा अरुण जेटली के नजदीकी रहे हैं और बीजेपी के कई नेताओं ने उनके पुराने संबंध रहे हैं. इसलिए आरसीपी उन्हें दिल्ली बुलाकर ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं बनाना चाहते और जेडीयू के लिए ये काम अपने जिम्मे रखकर पार्टी में अपना वैल्यू बनाए रखना चाह रहे थे.




2020 चुनाव में नीतीश कुमार को गुमराह करते रहे आरसीपी
पार्टी के सूत्रों के मुताबिक साल 2020 में भी विधानसभा चुनाव के दरमियान सीटों के बंटवारे को लेकर आरसीपी सिंह बीजेपी की हां में हां मिलाते चले गए. जेडीयू सुप्रीमो को अंतिम समय तक उन्होंने अंधेरे में रखा और अंत में ये कहते हुए कन्नी काट जाते थे कि बीजेपी इससे कम पर बात मानने को तैयार नहीं हुई.

जेडीयू साल 2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सहयोगी थी. लेकिन, एलजेपी जेडीयू के खिलाफ हर सीट पर अपना उम्मीदवार खड़ा किए हुए था, जिसको लेकर जेडीयू में नाराजगी थी. लेकिन, आरसीपी सिंह की भाषा बीजेपी को लेकर कभी भी तल्ख नहीं होती थी और उनके एक्शन में भी बीजेपी को लेकर नरमी बड़े नेताओं को दिखाई पड़ने लगा था.

जेडीयू के एक सांसद कहते हैं कि आरसीपी सिंह बीजेपी के बिहार प्रभारी भूपेन्दर यादव के जरिए बड़े नेताओं से नजदीकी बनाने की फिराक में थे. जिसमें वो सफल हो चुके थे क्योंकि आरसीपी सिंह को जेडीयू में अपना भविष्य नजर नहीं आ रहा था.




जेडीयू कोटे से मंत्री बनाए जाने को लेकर भी झूठ
जेडीयू कोटे से दो मंत्री बनाए जाने को लेकर आरसीपी सिंह नीतीश कुमार से झूठ बोलते रहे. असल में आरसीपी सिंह राज्यसभा में जेडीयू के नेता थे और नीतीश कुमार के बाद पार्टी में उनकी हैसियत दो नंबर की है, ये सबको पता था. साल 2019 में लोकसभा चुनाव के बाद एनडीए की सरकार बनी, जिसमें आरसीपी सिंह नीतीश कुमार को आश्वस्त करते रहे कि बीजेपी दो कैबिनेट मंत्री और एक राज्य मंत्री पद जेडीयू को देने के लिए तैयार है. सरकार बनने के बाद मंत्रिमंडल का गठन हो रहा था, तब जेडीयू को एक ही मंत्री पद का ऑफर मिला. ऐसे में नीतीश कुमार ने मंत्रिमंडल में एक मंत्री पद पाने के ऑफर को ठुकरा दिया और सीधा वापस दिल्ली से पटना लौट आए.

दरअसल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष साल 2019 में नीतीश कुमार थे. इसलिए उन्होंने केन्द्र सरकार को बाहर से समर्थन देने का ऐलान किया था. नीतीश कुमार बीजेपी के रवैये से आहत थे और उन्हें अपने बेहद करीबी आरसीपी सिंह पर भी शक होने लगा था. लेकिन, उन्हें बेनिफिट ऑफ डाउट इस शर्त पर दे रहे थे कि उनका सालों का करीबी अधिकारी उन्हें कैसे झांसा दे सकता है.

साल 2021 में नीतीश कुमार का शक यकीन में तब बदल गया जब आरसीपी सिंह की बात एक बार फिर झूठ साबित हुई. आरसीपी इस बार भी नीतीश कुमार को आश्वस्त कर चुके थे कि बीजेपी इस बार जेडीयू को दो मंत्री पद देने के लिए तैयार हो गई है.

आरसीपी सिंह इस समय जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए थे इसलिए पार्टी की ओर से बात करने की औपचारिक जिम्मेदारी उन्हें ही सौंपी गई थी. आरसीपी सिंह के कहने पर जेडीयू के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह भी मंत्री बनने को तैयार थे. लेकिन, इस बार फिर बीजेपी द्वारा एक ऑफर दिए जाने जेडीयू आहत थी. लेकिन, आरसीपी सिंह ने मंत्री पद स्वीकार करने पर आमदा थे. जबकि नीतीश कुमार इसके लिए तैयार नहीं थे.


इसलिए आरसीपी के शपथ से जेडीयू ने बनाई थी दूरी
पार्टी में नीतीश कुमार और दूसरे वरिष्ठ नेता ललन सिंह को आरसीपी सिंह लंबे समय से झांसा दे रहे थे, ये अब साफ हो चुका था. इसलिए आरसीपी सिंह जब मंत्री पद का शपथ ले रहे थे तब समारोह में जेडीयू का कोई भी नेता मौजूद नहीं था.

इतना ही नहीं जातिय जनगणना से लेकर अन्य मुद्दों पर आरसीपी पार्टी लाइन से हटकर बीजेपी की भाषा बोलने लगे थे. इसलिए नीतीश कुमार ने जेडीयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह को बनाकर आरसीपी सिंह पर लगाम लगना शुरू कर दिया.
कहा जाता है कि राजीव रंजन सिंह साल 2021 में पूरे तरीके से मंत्री बनने का मन बना चुके थे और मंत्रीमंडल विस्तार से पहले वो नए कपड़े भी सिलवा चुके थे. लेकिन, सच का पर्दाफाश होने के बाद राजीव रंजन सिंह ने आरसीपी सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था.


नीतीश कुमार की बातों को बीजेपी के सामने दूसरा एंगल दिया
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के संवाद को भी आरसीपीवी बीजेपी के सामने उल्टा पेश करते थे. जिसकी जानकारी नीतीश कुमार को मिल गई थी. असल मेंनीतीश कुमार जेडीयू के एक सीनियर नेता को राज्यपाल बनाना चाहते थे. इसलिए ये जिम्मेदारी पार्टी की ओर से एकमात्र मंत्री आरसीपी सिंह को दी गई कि वो नीतीश कुमार के इस संवाद को बीजेपी के शीर्ष नेता तक पहुंचा दें.
सूत्रों के मुताबिक आरसीपी मैसेज लेकर तो गए लेकिन मैसेज ऐसा दे दिया, जिससे काम बनने की बजाय उल्टा पड़ गया. नीतीश कुमार बीजेपी के रवैये से हैरान हुए. लेकिन, इस दफा बीजेपी टॉप बॉस के पास अलग दूत भेजकर सच पता लगाने की कोशिश की. नीतीश कुमार सच जानकर हैरान थे. लेकिन, पूरी तरह आश्वस्त हो चुके थे कि आरसीपी सिंह लगातार उन्हें और पार्टी को झांसा देने का काम कर रहे हैं.

जाहिर है नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह के राज्यसभा के कार्यकाल को एक्सटेंड न कर उन्हें 7 जुलाई से पहले रिजाइन करने को मजबूर कर दिया.. वहीं अब पार्टी ने उनकी 23 साल के भीतर जमा की गई संपत्ति पर सवाल उठाकर उनकी ईमानदारी को लेकर भी सवाल उठा दिए हैं . जाहिर है आरसीपी सिंह ने जेडीयू को टाटा बाय बाय कह दिया है. लेकिन, 25 सालों में नीतीश के बेहद करीब पहुंच चुके आरसीपी सिंह के लिए राजनीति में नई जमीन तैयार करना दूर की कौड़ी साबित होगा.

Input : Tv9 bharatvarsh

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