बिहार मे BJP-JDU के बीच नहीं रही पहले जैसी मधुरता, दो बड़े फैसलों से नीतीश ने कराया मजबूती का एहसास

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अरविंद शर्मा, पटना: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की निरपेक्ष अभिव्यक्ति, आरसीपी सिंह को जदयू की कमान, मीडिया में राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी का तल्ख बयान, अरुणाचल प्रदेश की घटना पर आक्रोश और मलाल से संकेत साफ है कि सत्ता पक्ष के दो बड़े दल भाजपा और जदयू के संबंधों में पहले की तरह मधुरता और सहजता नहीं है। जदयू ने रविवार को दो बड़े फैसले किए। नया अध्यक्ष चुना और भाजपा के प्रति कड़ी नाराजगी व्यक्त की। दोनों फैसले एक दूसरे से जुड़े हैं। राजनीतिक दल के रूप में जदयू ने अपने स्वतंत्र और मजबूत अस्तित्व को ध्यान में रखकर ऐसे फैसले किए हैैं। यह संकेत भी है कि पार्टी ऐसे ही दमखम के साथ आगे बढ़ने वाली है और संख्या बल की वजह से छोटे भाई जैसे संबोधन उसे पसंद नहीं।

उसकी बड़ी पूंजी नीतीश कुमार की साख है।

कुछ और कह रहे हालात..

दरअसल, 2020 में बिहार में सरकार गठन के बाद सत्ता पक्ष के नेता इससे इनकार करते हैैं कि भाजपा-जदयू के बीच कोई दरार-तकरार है, मगर हालात कुछ और कह रहे थे। लोजपा के मामले में विधानसभा चुनाव से पहले से ही गलतफहमी चली आ रही थी, जो सरकार बनने के बाद भी आंशिक रूप से प्रकट होती रही। अरुणाचल प्रदेश में जदयू की टूट के बाद तो विपक्ष भी आईना दिखाने लगा था। कई तरह की चर्चाएं सवाल के रूप में हवा में तैर रही थीं। आरसीपी सिंह को जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मित्र दलों के संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने और विपक्ष की शंकाओं का जवाब देने का फार्मूला भी निकाल लिया है। नेतृत्व परिवर्तन की वजह यह भी थी कि नीतीश कुमार बिहार में सुशासन के काम को और बेहतर ढंग से पूरा करें और इसके साथ ही राजनीतिक दल के रूप में जदयू इतनी मजबूत बने या दिखे कि गठबंधन के साथी और विपक्ष के लोग उसका सही आकलन कर सकें।

आरसीपी सिंह एक साथ कई मर्ज की दवा

आरसीपी सिंह एक साथ जदयू के कई मर्ज की दवा हो सकते हैैं। मंत्रिमंडल विस्तार के मुद्दे पर राजग के घटक दलों से समन्वय की बात हो या बिहार में गठबंधन की सरकार चलाते हुए कई बार पार्टी का पक्ष रखने की समस्या। आरसीपी खुलकर बोल सकते हैैं। भाजपा के साथ समन्वय में लोचा पर जदयू के हक की बात कर सकते हैैं। दूसरी सबसे बड़ी सहूलियत होगी कि बिहार से बाहर संगठन के विस्तार में नीतीश कुमार की प्रशासनिक व्यस्तता अब आड़े नहीं आएगी। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष होते हुए भी नीतीश बिहार में ही इस तरह व्यस्त रहते थे कि संगठन के अन्य कार्यों के लिए फुर्सत नहीं निकाल पाते थे।

दूसरे प्रदेशों में संगठन विस्तार में अब कोई संकोच नहीं

लव जिहाद पर भाजपा से अलग जदयू की स्पष्ट राष्ट्रीय नीति और अरुणाचल के मलाल के साथ जदयू में नेतृत्व परिवर्तन के बाद यह भी तय हो गया कि दूसरे प्रदेशों में संगठन विस्तार में अब कोई संकोच नहीं रहेगा। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव आने वाला है। वहां की प्रदेश इकाई का लगातार दबाव है। किंतु आलाकमान की ओर से अभी तक साफ नहीं किया जा रहा था। माना जा रहा है कि कार्यकारिणी के फैसले के बाद जल्द ही पश्चिम बंगाल में चुनाव को लेकर भी स्पष्ट घोषणा हो सकती है। भाजपा के खिलाफ प्रत्याशी उतारने से भी गुरेज नहीं होगा।

इनपुट : जागरण

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