मकर संक्रांति हिंदू धर्म का प्रमुख और अत्यंत पावन पर्व है, जिसे पूरे भारत में अलग–अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। यह पर्व तिथि से नहीं बल्कि सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश से जुड़ा है।
इस वर्ष सूर्य देव 14 जनवरी की रात्रि 9 बजकर 18 मिनट के बाद धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार सूर्यास्त के बाद होने वाले गोचर की संक्रांति अगले दिन मनाई जाती है। इसी कारण इस बार मकर संक्रांति 15 जनवरी, गुरुवार को मनाई जाएगी।
मकर संक्रांति के साथ ही सूर्य की उत्तरायण गति प्रारंभ होती है, जिसे शुभ, पुण्यदायी और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उत्तरायण काल देवताओं का दिन होता है और इस समय किए गए स्नान, दान, जप-तप और पूजा-पाठ का फल कई गुना बढ़ जाता है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस दिन गंगा स्नान और सूर्य उपासना से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
इस वर्ष मकर संक्रांति का पुण्यकाल सुबह 6 बजकर 37 मिनट से सूर्यास्त शाम 5 बजकर 17 मिनट तक रहेगा। वहीं महापुण्य काल प्रातः 6:37 से दोपहर 1:19 बजे तक माना गया है। इस अवधि में दान, जप और धार्मिक अनुष्ठान अत्यंत फलदायी माने गए हैं।
मकर संक्रांति के दिन स्नान के उपरांत सूर्य देव, नवग्रहों और भगवान विष्णु की पूजा कर दान करना श्रेष्ठ माना जाता है। इस दिन तिल, गुड़, खिचड़ी, ऊनी वस्त्र और अन्न का दान विशेष शुभ फल प्रदान करता है। मान्यता है कि मकर संक्रांति से दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं, जिससे प्रकाश और ऊर्जा की वृद्धि होती है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार उत्तरायण काल में देह त्याग करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाभारत में पितामह भीष्म ने भी उत्तरायण की प्रतीक्षा कर देह त्याग किया था। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में उत्तरायण के महत्व को बताया है।
सेहत की दृष्टि से भी मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। सूर्य की किरणें इस समय औषधि का काम करती हैं और पतंग उड़ाने के दौरान शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा मिलती है।
इस प्रकार मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि धर्म, स्वास्थ्य, प्रकृति और दान का समन्वय है, जिसे 15 जनवरी को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाना शास्त्रसम्मत और श्रेष्ठ माना गया है।
