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कोविड से मौत के बाद शव तक लेने की जहमत न उठाने वाले बेटे-बेटी अब अनुदान के लिए लिखा-पढ़ी करने में जुटे हैं। कोविड काल में आए इस तरह के अनेक मामलों ने विभाग की भी समस्या बढ़ा दी है। भुगतान के लिए प्रशासन को अतिरिक्त कसरत करनी पड़ रही है। इस तरह के कई मामले सामने आने के बाद अंचलाधिकारी को अंतिम रूप से कोविड मृतक के वारिस की पहचान का जिम्मा सौंपा गया है।

पारू के एक परिवार का वृद्ध कोविड का शिकार हो गया। इसके बाद परिजनों ने उन्हें एसकेएमसीएच में भर्ती करा दिया। भर्ती कराने के बाद संक्रमण के भय से कोई देखने तक नहीं आया। अब मौत के बाद परिवार में अनुदान लेने की जंग छिड़ी है। पत्नी नहीं है, तीन बेटे-बेटियां हैं। सभी ने आवेदन देकर दूसरे को अनुदान न देने का आग्रह किया है। सभी खुद को ही वास्तविक वारिस बता अनुदान की मांग कर रहे हैं।

पति की मौत के बाद पत्नी व पत्नी की मौत के बाद पति अनुदान का स्वाभाविक हकदार होता है, लेकिन जब उस पीढ़ी में कोई जीवित न बचा हो तो अनुदान की राशि अगली पीढ़ी यानी बेटे-बेटी को भुगतान किया जाता है। अब ऐसे कई मामले सामन आए हैं, जब बेटे-बेटियों में आपसी सहमति नहीं है कि भुगतान किसे किया जाए। लिहाजा, सभी मामलों को संबंधित सीओ को जांच के लिए भेज दिया गया है। सीओ यह सत्यापित करेंगे कि पति की मृत्यु की स्थिति में वारिस पत्नी हो व पत्नी की मृत्यु की स्थिति में वारिस पति हो। पति या पत्नी के जीवित न होने की स्थिति में राशि का बंटवारा सभी भाई-बहनों में समान रूप से करने का प्रावधान किया गया है। इसके लिए कोविड मृतक की सभी फाइलों को सत्यापन के लिए संबंधित सीओ को भेजते हुए प्रतिवेदन की मांग की गई है।

196 अनुदान स्वीकृत, 16 का ही सत्यापन

मृतक के वारिस की खोज ऐसा टास्क है, जिसमें अधिकांश सीओ पानी-पानी हो रहे हैं। हालत यह है कि राज्य मुख्यालय ने अबतक 196 मृतकों के वारिस को अनुदान देना स्वीकार किया है। ये सभी फाइलें संबंधित सीओ को डेढ़ माह पहले भेजी गई। लेकिन अंतिम रूप से अबतक 16 मृतकों के वारिस का ही सत्यापन हो पाया है। सीओ की ओर से सत्यापन की इस प्रक्रिया को अभिलेख तैयार करना कहते हैं। आपदा प्रबंधन के अपर समाहर्ता डॉ. अजय कुमार ने बताया कि जैसे-जैसे अभिलेख तैयार होकर आ रहा है, जिला नजारत से भुगतान का आदेश जारी हो रहा है। फिलहाल 16 अभिलेख ही तैयार हो पाया है।

Input : Live Hindustan

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