बिहार की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था पर करारा सवाल खड़ा करने वाला एक बेहद अनोखा और प्रतीकात्मक मामला सामने आया है। मुजफ्फरपुर जिले के चर्चित मानवाधिकार अधिवक्ता एस.के. झा ने एक जीवित पुलिस दरोगा रामचंद्र सिंह का गया जी में हिंदू रीति-रिवाज से विधिवत श्राद्ध कर दिया। यह श्राद्ध किसी व्यक्तिगत द्वेष का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ एक सशक्त संदेश माना जा रहा है, जिसमें गलत जांच करने वाला अधिकारी वर्षों तक कानून और अदालत को गुमराह करता रहा।
मामले की जड़ वर्ष 2012 से जुड़ी है, जब अहियापुर थाना क्षेत्र के नेउरी गांव निवासी सरकारी शिक्षक अनंत राम को एक झूठे दुष्कर्म के मामले में फंसा दिया गया। इस केस के जांच अधिकारी तत्कालीन दरोगा रामचंद्र सिंह थे। आरोप है कि उन्होंने तथ्यों को दरकिनार कर गलत अनुसंधान किया, शिक्षक अनंत राम को गिरफ्तार कर जेल भेजा और उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी। इसके बाद ट्रायल शुरू हुआ।
ट्रायल के दौरान जब सच्चाई सामने आने लगी और अदालत ने दरोगा रामचंद्र सिंह को गवाही के लिए तलब किया, तब उन्होंने एक चौंकाने वाला कदम उठाया। एसएसपी मुजफ्फरपुर के माध्यम से उनकी पत्नी द्वारा कोर्ट में दरोगा का डेथ सर्टिफिकेट जमा करा दिया गया, जिसमें उनकी मृत्यु तिथि 15 दिसंबर 2009 दर्ज थी, जबकि उसी दरोगा ने 2012 में इस मामले की जांच की थी। इस विरोधाभास को अधिवक्ता एस.के. झा ने अदालत के सामने उजागर किया और सवाल उठाया कि 2009 में मृत व्यक्ति 2012 में जांच कैसे कर सकता है।
जब अदालत ने जांच के आदेश दिए, तो दरोगा रामचंद्र सिंह ने अपना तबादला करवा लिया और कोर्ट की नजर में ‘ट्रेसलेस’ हो गया। विभाग ने भी उसकी कोई ठोस जानकारी देने में असमर्थता जताई। हैरानी की बात यह रही कि इन्हीं परिस्थितियों के बावजूद निचली अदालत ने शिक्षक अनंत राम को सात साल की सजा सुना दी। बाद में पटना हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए उन्हें बाइज्जत बरी किया और उनकी नौकरी भी बहाल हुई।
इस अन्याय से आहत होकर अधिवक्ता एस.के. झा ने 14 वर्ष पूर्व जनेऊ तोड़कर संकल्प लिया था कि जब तक इस “मृत घोषित जीवित दरोगा” की सच्चाई सामने नहीं लाएंगे, तब तक जनेऊ धारण नहीं करेंगे। करीब 12 वर्षों बाद उन्होंने प्रमाण सहित दरोगा के जीवित होने की पुष्टि की और पुनः जनेऊ धारण किया। चूंकि अदालत के रिकॉर्ड में आज भी दरोगा रामचंद्र सिंह मृत दर्ज हैं, इसलिए अपने संकल्प के 14 वर्ष पूरे होने पर अधिवक्ता ने गया जी में उनका विधिवत श्राद्ध और पिंडदान कराया।
अधिवक्ता एस.के. झा का कहना है कि यह श्राद्ध किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है, जो गलत अधिकारियों को संरक्षण देता है और निर्दोषों को सालों जेल में सड़ने को मजबूर करता है। उनका मानना है कि शायद यही प्रतीकात्मक विरोध प्रशासन और न्यायपालिका को आत्ममंथन के लिए मजबूर करे।
